अमरूद एक भारतीय फल है । वैज्ञानिकों का मानना है कि इसका उद्गम स्थल वेस्टइंडीज है जहां से ये धीरे धीरे विश्व के अन्य देशों में फैल गई है । यह भारत के लगभग हर क्षेत्रों में आसानी से उपलब्ध हो जाती है । यह औषधीय और व्यावसायिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है इसलिए इसका कई जगह भारी मात्रा में खेती भी की जाती है । इसे लोग जामफल या जाम के नाम से भी जानते हैं ।




परिचय

अमरूद वृक्ष में लगने वाला एक फल है जो स्वाद में मीठा होता है । प्रायः यह सभी प्रकार के वातावरण में उग जाते हैं मगर गर्म क्षेत्रों में इसकी उत्पादन अधिक देखी गई है मगर ऐसा भी नहीं है कि वातावरण कुछ ज्यादा ही गर्म हो । यह आकार में भिन्न भिन्न प्रकार का हो सकता है, कुछ छोटे आकार के गोल होते हैं तो कुछ बड़े आकार के गोलाकार होते हैं , तो कुछ मध्यम आकार में अंडाकार होते हैं । इसका फल जब कच्चा होता है तब इसके बाहर के छिलका का रंग हरा होता है । कई प्रजाति के अमरूद को कच्चा खाने से भी ये स्वादिष्ट होते हैं । जब फल पकने लगता है तब इसका बाहरी भाग पीला होने लगता है । इसका फल जब पेड़ पर पकता है तभी यह स्वादिष्ट होता है यदि इसके फल को तोड़कर पकाया जाता है तब इसे खाने से इसका स्वाद बिगड़ जाता है ।

कुछ लोग ऐसे नमक के साथ भी खाते हैं अर्थात लोग इसे अपनी पसंद के अनुसार खाते हैं । कुछ लोग अर्द्ध पका फल को तो कुछ लोग अच्छे से पके फल को खाना पसंद करते हैं । भारत में गर्मी के महीनों में इसे आप बाजार में आसानी से देख सकते हैं । फल के अंदरूनी भाग के आधार पर भी यह दो प्रकार के हो सकते हैं । अधिकतर प्रजातियों का अंदर का भाग सफेद होता है मगर अमरूद कि एक प्रजाति ऐसी भी होती है जिसका अंदर का भाग लाल होता है । आम तौर पर सभी अमरूद के अंदर ढेर सारी छोटी - छोटी बीज पाई जाती हैं जो स्वाद पर कोई प्रभाव नहीं डालती । इस फल में विटामिन सी प्रचुर मात्रा में पाई जाती है, इसके अलावा भी अन्य विटामिन्स पाई जाती हैं मगर विटामिन - सी की मात्रा सर्वाधिक होती है ।

यह फल न केवल स्वादिष्ट होती है बल्कि औषधीय गुणों से भी परिपूर्ण होती है । इसका भारत में व्यावसायिक उपयोग भी काफी फैला हुआ है । लोग इसका भारी मात्रा में खेती करते हैं । वैसे तो सामान्य फल के बीजों से इसके ढेर सारी पौधे उग आते हैं मगर उत्तम किस्म के फल और रोग मुक्त फल की प्राप्ति के लिए हाइब्रिड प्रकार के पौधे का खेती के रूप में चयन किया जाता है । हाइब्रिड पेड़ जब छोटा होता है तभी से ही फल देने लगता है । इसका खेती में सबसे बड़ा लाभ ये होता है कि एक बार इसे उगा दिए तो कम देखभाल में भी ये कई वर्षों तक आपको पैदावार देती रहेगी ।

अमरूद की प्रमुख प्रजातियां

[1] इलाहाबाद सफेदा - ये चिकनी सतह वाले मध्यम तथा गोलाकार होती है । इनका वजन 150-180 ग्राम आस पास होती है । ये स्वाद में मीठे होते हैं तथा भंडारण के लिए बाकी प्रजातियों की तुलना में अच्छी होती हैं ।

[2] लखनऊ 49 - खुरदुरी सतह वाली, अंडाकार आकार में । स्वाद में मिठास के साथ हल्का सा खट्ठास । इसमें उकठा रोग लगने की संभावना कम होती है ।

[3] ललित - खुरदुरी त्वचा वाली यह फल मध्यम आकर वाली गोलाकार अथवा अंडाकार होती है । इसक औसतन वजन 250 से 300 ग्राम होती है । इसका सबसे खास बात इसका गुदा होता है जो गुलापी रंग की होती है ।

[4] एप्पल कल्चर - यह चिकनी सतह वाली गोलाकार आकार में होती है । इसकी भंडारण छमता मध्यम होती है ।

[5] चित्तीदार - यह चिकनी सतह वाली गोलाकार आकार में होती है । इसकी सतह में लाल धब्बे पाए जाते हैं इसी कारण से इसको चित्तीदार करते हैं । इसका स्वाद मीठा होता है ।

[6] श्वेता - यह चिकनी सतह वाली बड़े आकार की फल होती है । इसका औसतन वजन 300 ग्राम तक होता है यह स्वाद में बहुत मधुर होता है ।

इनके अलावा अर्का मृदुला, इलाहाबाद सुर्खा, धारी दार, अर्का अमुल्या तथा सफेद जाम इत्यादि प्रजाति प्रमुख हैं ।

अमरूद की खेती

भारत विश्व में अन्य देशों की तुलना में अमरूद का सबसे ज्यादा उत्पादक देश है ।  इससे यह साबित होती है कि भारत में इसकी खेती कितने लोग कर रहे हैं । यह भारत में सबसे ज्यादा उगाई जाने वाली फल में चौथे नंबर पर है । इसकी खेती के लिए उचित प्रजाति का चयन कर लें । वैसे तो अमरूद किसी भी वातावरण में उग जाता है मगर इसकी खेती के लिए इसके पौधे को जुलाई - अगस्त में उगाया जाता है तथा जिन क्षेत्रों में पर्याप्त मात्रा में सिंचाई कि सुविधा होती है वे फरवरी- मार्च में भी इसकी खेती कर सकते हैं । इसकी खेती के लिए 25- 300 सेंटीग्रेड तापमान उपयुक्त माना जाता है ।।

पौधे का चयन


मुुख्यतः दो विधियों द्वारा बहुतायत होती है जो निम्न है -

(1) कलम विधि
(2)  जड़ युक्त पौधा

(1) कलम विधि - यह एक सस्ता विधि है । इस विधि में एक पहले से विकसित किसी पेड़ की मदद ली जाती है तथा कलम विधियों के द्वारा पेड़ की डालियों से नया पौधा विकसित कर उसे खेत में उगाया जाता है ।

(2)  जड़ युक्त पौधा - इसमें जिस प्रजाति के अमरूद को उगाना है उसके पके हुए फल के बीजों को बो दिया जाता है तथा इन बीजों से विकसित नया पादपों को खेती में प्रयुक्त किया जाता है अथवा बाहर से उत्तम किस्म वाले अमरूद के छोटे पौधे खरीदे जाते हैं ।

भूमि का चयन


इसमें उस खेत या क्षेत्र को चुना जाता है जहां अमरूद की खेती की जानी है । आप जितने क्षेत्र में इसकी खेती करना चाहते हैं उस भूमि का चयन कर लें । भूमि चयन समय एक बात का ध्यान रखें कि मृदा का pH मान 6 से 7.5 तक होनी चाहिए ।

खेती योग्य भूमि के चयन करने के बाद मिट्टी की कठोरता को दूर करने हेतु खेत की जुताई कर लें ।

पौधे के लिए गड्ढा


अमरूद के पौधे को उगाने के लिए 60 सेमी लंबाई - चौड़ाई तथा 60 सेमी गहराई वाली गड्ढा बनाया जाता है ।

पौधे को उगाना

गड्ढा तैयार करने के पश्चात पौधे को आवश्यक तत्व की आपूर्ति करने के लिए पहले ही उसे आवश्यक तत्व दे दी जाती है । पौधे को गड्ढे में उगाने से पहले उसमे  गोबर की खाद अथवा कम्पोस्ट खाद डाला जाता है इसके बाद इसमें पौधे को उगाया जाता है । पौधे की जड़ को ढांकने के लिए मिट्टी में खाद को मिलाकर ढंक सकते हैं । कई किसान पौधे को फास्फोरस तथा पोटेशियम की आपूर्ति के लिए इस मिट्टी में 500 ग्राम सुपर फॉस्फेट तथा 250 ग्राम पोटास मिलाते हैं । पौधे को उगाने के पश्चात उसे उचित पानी भी से दें ताकि पौधा मुरझाए नहीं । आप पौधा को शाम की समय भी उगा सकते हैं इससे पौधे की मुरझाने या मरने की संभावना बहुत कम हो जाती है । जब पौधा बड़ा हो जाता है तो समय समय में इसकी कटाई - छंटाई की जाती है ।


पौधे की सिंचाई


पौधे की पानी कि आवश्यकता को पूरी करने के लिए सिंचाई अति आवश्यक है । सिंचाई भूमि के प्रकार पर भी निर्भर करती है । सामान्यतः 6-15 दिनों के अंतराल पर सिंचाई की जाती है । यदि भूमि हल्की हो तो 5-7 दिनों के अंतराल तथा भूमि भारी हो तो 7-15 दिनों के अंतराल पर सिंचाई की जाती है ।


फल निर्माण


जब पेड़ में फूल लगने लगता है उसके पश्चात कुछ दिनों में ही फल लगने लग जाते हैं । फूल लगने के 60 - 90 दिनों में फल पकने लग जाते हैं । फल पकने के पश्चात आप इन्हें तोड़कर बाजार में बेच सकते हैं ।


रोग तथा किट


अमरूद के पेड़ में विभिन्न प्रकार के रोग एवं कीड़े भी लगते हैं यह लक्षण पादप अवस्था में तो नहीं लेकिन कुछ वर्षों पश्चात जब पेड़ बन जाता है तब इसमें रोग के लक्षण दिखने को मिलते हैं । अमरूद के पेड़ में सबसे सामान्य रोग " उकठा" होता है जिसमें पत्तियां भुरी पड़ने लगती हैं तथा डालियों की पत्तियां धीरे धीरे मुरझाने लगती हैं तथा कुछ समय पश्चात पेड़ के अधिकतर पत्ते मुरझाकर सूखने लगते हैं । इस रोग से बचाव के लिए चुना अथवा जिप्सम को प्रभावित पेड़ के मिट्टी में मिलाकर प्रभाव को कम किया जा सकता है तथा उपचार के लिए 1 ग्राम बेनलेट प्रति लीटर पानी के हिसाब से 20 लीटर पानी से पेड़ के आस पास की मिट्टी को उपचारित करें ।

इसके पेड़ के तनों में एक प्रकार के किट अथवा कीड़े लग जाते हैं जो तने के ऊपरी त्वचा को खाकर गड्ढे बना देती हैं तथा काल अवशेष छोड़ देती है । इससे बचाव के लिए प्रभावित जगहों पर मिट्टी तेल अथवा पेट्रोल को रूई अथवा कपड़े के माध्यम से अंदर डालना चाहिए तथा गड्ढे को गीली मिट्टी से बंद कर देना चाहिए ।

औषधीय उपयोग

1. पाचन में मददगार होती है ।
2. सुबह खाली पेट पके अमरूद का सेवन करने से कब्ज में लाभ मिलता है ।
3. पीत समस्याओं में फायदेमंद होती है ।

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