Congo fever in hindi

कांगो बुखार / ज्वर (Congo Fever) एक आम ज्वर से कई गुना ज्यादा खतरनाक है । अगर समय पर इसका पता नहीं चला और सही इलाज न मिल पाने पर रोगी की मौत भी हो सकता है । ऐसे पता न चलने और समय पर सही इलाज न मिल पाने के कारण 30 फीसदी लोगों की जान चली जाती है । इसका पूरा नाम क्राइमियन कांगो हेमोरेजिक फीवर (CCHF) होता है ।



क्या है कांगो ज्वर/ बुखार (Congo Fever)


यह एक विषाणु जनित रोग है जिसका वाहक पशुओं के शरीर में पाया जाने वाला एक प्रकार का कृमि अथवा कीड़ा होता है जिसे कई जगहों में किरनी भी कहा जाता है । यह वाहक आमतौर पर पशुओं के त्वचा पर चिपके रहते हैं तथा उनका खून चूसते हैं मगर आस पास अगर लोगों की हलचल ज्यादा होती रहती है तो ये मनुष्यों में भी चला जाता है । 


कांगो ज्वर (Congo fever) का सबसे पहला केस 1944 में क्रीमिया नामक देश में देखा गया और इस रोगजनित के वाहक की पहचान ह्यालोमा टिक (Hyalomma tick) के रूप में कि गई । धीरे धीरे यह रोग अन्य देशों में जैसे - 1969 को कांगो में ,  इसके अलावा दक्षिण अफ्रीका, पाकिस्तान और ईरान में भी इसका प्रभाव देखा गया । 


इस विषाणु का वाहक घरों में पाले जाने वाले मवेशियों जैसे - गाय, बैल, भैंस और बकरी इत्यादि से मानव में होता है । इसी कारण से डॉक्टरों को मानना है कि यह विषाणु उनमें उनमें ज्यादा होती है जिनके आस पास मवेशी होते हैं ।


वायरस का संक्रमण


यह वायरस RNA पर अटैक करता है जिस कारण से मनुष्यों कि रोग प्रतिरोधी क्षमता कम होने लगती है और ऐसे स्थिति में अन्य कमजोर विषाणु जो प्रतिरोधी क्षमता की उपस्थिति में प्रभाव नहीं दिखा पा रहे थे वे भी रोगी को प्रभावित करने लगते हैं । अतः अगर सही समय पर सही इलाज न मिले तो इससे रोगी की मृत्यु भी हो सकती है ।


जैसा कि आपको पाता है इसका वाहक ह्यालोमा टिक होता है जो मवेशियों को त्वचा में चिपका रहता है और उनका रक्त चूसता है इस कारण से मवेशी भी इस रोग से ग्रसित हो जाते हैं और ऐसे मवेशियों को अगर इंसान खाते हैं तब वायरस से संचरण की संभावना होती है। इसके अलावा यदि कोई पक्षी भी इस प्रकार के रोग से ग्रसित मवेशी की अवशेष को खाता है तब उसके माध्यम से भी वायरस संचरण कर मनुष्यों तक पहुंच सकता है ।


यह विषाणु मानव शरीर में 3 से 9 दिनों में पूरे शरीर में फ़ैल जाता है और अपना प्रभाव दिखाना सुरु कर देता है ।



कांगो ज्वर के लक्षण 


1. मरीज को ज्वर, सिर में दर्द और मांशपेशियों में दर्द होती है ।

2. गला बैठ जाती है ।

3. चक्कर आना, आंखो में जलन तथा रोशनी से डर लगाना ।

4. पीठ दर्द तथा उल्टी होना ।

5. नाक व मुंह से खून आना ( चिंताजनक स्थिति) ।


कांगो ज्वर से बचाव के उपाय


1. सबसे महत्वपूर्ण उपाय है ज्यादा से ज्यादा लोगों को इससे अवगत कराएं तथा किसी भी प्रकार की कोई लक्षण दिखती है तो बेहिचक अस्पताल जाने के लिए ज्यादा से ज्यादा लोगों को शिक्षा दें ।

2. ऐसे क्षेत्रों में जाने से बचें जहां ज्यादा मात्रा में ह्यालोमा टिक पाया जाता है ।

3. मवेशियों के नजदीक जाने से पहले या स्पर्श करने से पहले उचित कपड़े पहने ।

4. मवेशियों की संपर्क के पश्चात कपड़े को ह्यालोमा टिक रोधी से सुरक्षित करें ।

5. इस रोग से ग्रसित रोगी से एक निश्चित दूरी बनाए रखें ।

6. अगर किसी प्रकार के लक्षण दिखते हैं तो जल्द से जल्द अपने नजदीकी अस्पताल जाएं ।


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