छत्तीसगढ़ इतिहास - प्रागैतिहासिक काल (Prehistoric Era) हिंदी नोट्स

परिभाषा - ऐसा समय जिसके होने का कोई लिखित प्रमाण मौजूद नहीं है इसकी उपस्थिति का केवल पुरातात्विक साक्ष्यों पर ही अनुमान लगा कर की जा सकती है । उसका समयावधि को प्रागैतिहासिक काल कहते हैं ।

सर्वप्रथम 1836 में रोबोट ब्रुस फुट ने पल्लोरम (तमिलनाडु) मैं प्रागैतिहासिक काल की खोज शुरू की वे जियोग्राफिकल सर्वे ऑफ इंडिया से संबंधित थे इन्हें भारत के ऐतिहासिक खोजों का जनक भी कहा जाता है ।



छत्तीसगढ़ में शैल चित्रों को सर्वप्रथम बंगाल नागपुर रेल्वे के इंजीनियर सी.डब्यू. एंडरसन ने 1910 में खोजा था और इस कार्य में उनकी सहायता सी.जे. वेलिंगटन ने की थी । इसके बाद अनेक पुरातत्वविदों ने इन खोजों पर काम किया और अनेक प्रकाशन भी किए । इंडिया पेंटिग्स 1918 में तथा इन्साइक्लोपिडिया ब्रिटेनिका के 13 वें अंक में रायगढ़ जिले के सिंघनपुर के शैलचित्रों का प्रकाशन पहली बार हुआ था । अमरनाथ दत्त ने 1923 से 1927 के मध्य रायगढ़ के शैल चित्रो का सर्वेक्षण किया । डॉ एन. घोष, डी. एच. गार्डन, पंडित लोचनप्रसाद पांडेय आदि ने इन शैलचित्रो का अध्ययन किया, चित्तवा डोंगरी के शैलचित्रों को सर्वप्रथम श्री भगवान सिंह बघेल एंव डॉ रमेंद्रनाथ मिश्र ने उजागर किया, धनोरा के महापाषाण स्मारकों का सर्वेक्षण प्रो जे आर काम्बले और डॉ रमेंद्रनाथ मिश्र ने किया था ।

भारत में सबसे प्राचीनतम पाषाण औजार महाराष्ट्र के बोरी नामक जगह से मिली है जो लगभग 1400000 वर्ष पुराना है । इसके अलावा भी छत्तीसगढ़ में अनेकों ऐसी जगह हैं जहां प्रागैतिहासिक काल के साक्ष्य जैसे गुफाओं में बने चित्र और पाषाण की औजार एवं अनेक धातुएं धातु कलाकृतियां मिली है । छत्तीसगढ़ के रायगढ़ ज़ि‍ले में सिंघनपुर, कबरापहाड़, बसनाझार, ओंगना, करमगढ़, खैरपुर, बोताल्दाय, भंवरखोल, अमरगुफा, गाताडीह, सिरोली डोंगरी, बैनीपहाड़  आदि जगहों में पक्षी, सांप, हाथी, भैंस, अन्य पशु, जंगली सूअर, हिरन, नृत्य एवं शिकार करते लोग, आदि का अंकन है ।

विभिन्न इतिहासकारों ने अपने अनुसार अनुसार प्रागैतिहासिक काल को विभिन्न भागों में विभाजित किया परंतु अधिक मान्यता प्राप्त विभाजन में थॉमसन का विभाजन है । थॉमसन ने प्रागैतिहासिक काल को निम्न तीन भागों में बांटा है -

1. पाषाण काल (Stone Age)
2. कांस्य काल (Bronze Age)
3. लौह काल (Iron Age)

पाषाण काल

पाषाण का अर्थ होता है पत्थर अर्थात इस काल में धातु की अधिक जानकारी लोगों को नहीं थी वह पत्थरों से बने औजारों और हथियारों का उपयोग कर विभिन्न कार्यों का समन्वय करते थे । यह हजार ज्यादा धारदार नहीं होते थे और इनका अधिकतर उपयोग शिकार कार्यों में किया जाता था । इसी काल में लोगों ने पत्थर से आग चलाना सिखा था ।

छत्तीसगढ़ में इस काल से संबंधित विभिन्न साक्ष्य प्राप्त हुए हैं जिससे यह प्रमाणित होता है कि छत्तीसगढ़ में प्रागैतिहासिक काल से लोग रहते आ रहे हैं ।

इतिहासकारों ने पाषाण काल को पुनः तीन भागों में बांटा है  -

1. पूर्व पाषाण काल
2. मध्य पाषाण काल
3. उत्तर पाषाण काल या नवपाषाण काल

पूर्व पाषाण काल

इतिहासकारों के अनुसार इसे प्रागैतिहासिक काल का सर्वप्रथम काल माना जाता है यहां उपस्थित लोग या वास करने वाले लोग परिवार पत्थरों का उपयोग हथियारों के रूप में किया ।

छत्तीसगढ़ में पाषाण काल का साक्ष्य छत्तीसगढ़ के महानदी और रायगढ़ के सिंघनपुर  में मिले हैं , जिनमें पत्थरों से बने औजार शामिल है ।

मध्य पाषाण काल

इसे पूर्वा एवं नवपाषाण काल के मध्य रखा गया है क्योंकि पूर्व पाषाण काल को प्रागैतिहासिक काल का आरंभ माना जाता था और नवपाषाण काल को प्रागैतिहासिक काल का अंतिम काल माना गया था इसलिए इस दोनों अवधि के मध्य की अवधि को मध्य पाषाण काल कहा गया ।

इस काल में प्राप्त हथियार पूर्व पाषाण काल की अपेक्षा अधिक उत्तम और धारदार थी । इस काल के प्राप्त औजार लम्बे फ़लक के तथा अर्ध-चंद्राकार आकार के होते थे ।

छत्तीसगढ़ में इसका साक्ष्य रायगढ़ जिले के कबरा पहाड़ के चित्रित शैलाश्रय के निकट से मिली है ।

उत्तर पाषाण काल नवपाषाण काल

इस काल में लोग पत्थरों का उपयोग सही रूप से करना सीख गए थे । वे नुकीले पत्थरों को लकड़ी के आगे बांधकर इससे भाला बनाते थे और इसका उपयोग शिकार करने में करते थे ।

छत्तीसगढ़ में इसका साक्ष्य बिलासपुर के धनपुर और रायगढ़ के सिंघनपुर और महानदी में इस काल से संबंधित औजार प्राप्त हुए हैं ।

कांस्य काल

प्रागैतिहासिक काल के इस काल में लोगों को धातुओं का ज्ञान हो गया था । उन्हें तांबे और रांगा जैसे धातुओं का उपयोग करना आ गया था । इस काल के लोग तांबे और रांगे के मिश्र धातु कांस्य का उपयोग विभिन्न प्रकार के औजार और बर्तन निर्माण में उपयोग करते थे ।

लौह काल

इस काल के लोग लोहा धातु से परिचित हो गए थे तथा इससे बने और औजारों तथा हथियारों का प्रयोग करते थे । धमतरी बालोद मार्ग पर लोहे के कुछ उपकरण आदि प्राप्त हुए हैं ।

कांस्य और लौह काल को संयुक्त रूप से धातु काल कहा छत्तीसगढ़ में इस काल के उतने प्रमाण प्राप्त नहीं हुए हैं । धमतरी बालोद मार्ग पर लोहे के कुछ उपकरण आदि प्राप्त हुए हैं ।

छत्तीसगढ़ के प्रमुख स्थल जहां से प्रागैतिहासिक काल के शैलचित्र प्राप्त हुए हैं -

घनपुर – यहां डंडे तथा सीढ़ी के आकार की मानव अकृतियां हैं, जिसमे जलपरी, शिकार के दृश्य, नृत्य के दृश्य आदि हैं । इन आकृतियों की तुलना आस्ट्रेलिया में प्राप्त सीढ़ीनुमा पुरुष से की जाती है ।

कबरा पहाड़ – रायगढ़ के विश्वनाथपाली के निकट कबरा पहाड़ की सारी चित्रकारी लाल रंग से हुई है । छिपकली, सांभर, घड़ियाल इत्यादि चित्र हैं । समूह शिकार का सर्वप्रथम चित्र भी यहां है. यहां पर बना जंगली भैसे का चित्र रायगढ़ का विशालतम शैल चित्र है । यहां पाषाणयुगीन अर्धचन्द्राकार फलक वाले औजार भी प्राप्त हुए हैं ।

बसनाझर शैलाश्रय – सिंघनपुर से 8 कि.मी. दूर 2000 फुट की ऊंचाई पर बसनाझर शैलाश्रय है । इसमें शिकार एवं सामूहिक नृत्य के दृश्य हैं तथा जीव-जंतुओं के चित्र भी हैं । इन्हें 10 हजार साल पुराना माना जाता है । रायगढ़ जिले में प्राप्त हाथी का एकमात्र चित्र बसनाझर में है ।

ओंगना शैलाश्रय – ओंगना में मुखौटे लगाए हुए मानव का चित्र है। घडी के आकार का चित्र भी मिला है ।

कर्मागढ़ शैलाश्रय – यह रायगढ़ से 30 कि.मी. दूर हैं । इसमें 300 से अधिक बहुरंगी आकृतियां एवं जलचरों की आकृतियां हैं जो 300 फीट लम्बी तथा करीब 20 फीट चौड़े क्षेत्र में पूर्वमुखी पाषाण शिलाखंड पर अंकित है । यह चित्र मुख्य रूप से सफेद, पीला, लाल और गैरिक रंगों के हैं ।

छत्तीसगढ़ से प्राप्त सभी शैलचित्रों और औजारों वाले स्थान का विवरण


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